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حُبُّكِ
طيرٌ
أخضرُ ..
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طَيْرٌ
غريبٌ
أخضرُ ..
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يكبرُ
يا
حبيبتي
كما
الطيورُ
تكبْرُ
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ينقُرُ
من
أصابعي
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و
من جفوني
ينقُرُ
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كيف
أتى ؟
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متى
أتى
الطيرُ
الجميلُ
الأخضرُ
؟
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لم
أفتكرْ
بالأمر
يا
حبيبتي
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إنَّ
الذي
يُحبُّ
لا
يُفَكِّرُ
...
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حُبُّكِ
طفلٌ
أشقرُ
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يَكْسِرُ
في طريقه
ما يكسرُ
..
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يزورني
.. حين
السماءُ
تُمْطِرُ
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يلعبُ
في
مشاعري و
أصبرُ ..
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حُبُّكِ
طفلٌ
مُتْعِبٌ
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ينام
كلُّ
الناس يا
حبيبتي و
يَسْهَرُ
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طفلٌ
.. على
دموعه لا
أقدرُ ..
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حُبُّكِ
ينمو
وحدهُ
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كما
الحقولُ
تُزْهِرُ
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كما
على
أبوابنا ..
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ينمو
الشقيقُ
الأحمرُ
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كما
على
السفوح
ينمو
اللوزُ و
الصنوبرُ
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كما
بقلب
الخوخِ
يجري
السُكَّرُ
..
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حُبُّكِ
.. كالهواء
يا
حبيبتي ..
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يُحيطُ
بي
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من
حيث لا
أدري به ،
أو
أشعُرُ
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جزيرةٌ
حُبُّكِ ..
لا
يطالها
التخيُّلُ
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حلمٌ
من
الأحلامِ
..
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لا
يُحْكَى ..
و لا
يُفَسَّرُ
..
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حُبُّكِ
ما يكونُ
يا
حبيبتي ؟
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أزَهْرَةٌ
؟ أم
خنجرُ ؟
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أم
شمعةٌ
تضيءُ ..
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أم
عاصفةٌ
تدمِّرُ
؟
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أم
أنه
مشيئةُ
الله
التي لا
تُقْهَرُ
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كلُّ
الذي
أعرفُ عن
مشاعري
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أنكِ
يا
حبيبتي ،
حبيبتي ..
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و
أنَّ من
يًُحِبُّ
..
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لا
يُفَكِّرُ
..
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